गर्भस्थ शिशु को मां भावात्मक संस्कार दे सकती है : आचार्य

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महाश्रमण

महाश्रमण ने भगवती सूत्र में पुनर्जन्म व जीव के उत्पत्ति का किया वर्णन

विशेष प्रतिनिधि, छापर (चूरू). आचार्य महाश्रमण ने बुधवार को श्रद्धालुओं को भगवती सूत्र के आधार पर मंगल पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि एक जन्म से दूसरे जन्म में जीव जब गर्भ में जाता है तो वह इन्द्रियों के साथ जाता है अथवा बिना इन्द्रियों के जाता है?

छापर चतुर्मास प्रवास स्थल परिसर में बने प्रवचन पंडाल में आचार्य कहा जैन दर्शन में पुनर्जन्म को बहुत मजबूती से स्वीकार किया गया है। जब गर्भ में जीव आता है तो पूर्वकृत कर्म के आधार पर उसके शरीर का निर्माण होता है। जैन दर्शन भी कर्म से शरीर के निर्माण की बात को मानता है। यहां उत्तर में दोनों ही बातें कही गई हैं कि वह इन्द्रियों के साथ भी गर्भ में आता है और बिना इन्द्रियों के भी गर्भ में आता है।

इन्द्रियों के दो प्रकार बताए

इन्द्रियों के दो प्रकार बताए गए हैं-द्रव्य इन्द्रियां और भाव इन्द्रियां। पौद्गलिक इन्द्रियां कान, नाक, आंख इनको साथ लेकर नहीं जाता, किन्तु चेतना में जो भाव इन्द्रियां हैं, उनको साथ लेकर जाता है। इसी प्रकार प्रश्न पूछा गया कि क्या वह शरीर के साथ जाता है या बिना शरीर के जाता है। उत्तर में दोनों ही बातें बताई गईं। पांच प्रकार के शरीर बताए गए हैं। इनमें प्रथम तीन प्रकार के शरीर को लेकर कोई साथ नहीं जाता और बाद के दो शरीर साथ जाते हैं।

पुन: प्रश्न किया गया कि वह जीव सबसे पहले कौन-सा आहार ग्रहण करता है? उत्तर दिया गया कि सबसे पहले जीव माता का ओज और पिता का शुक्र-इन दोनों से मिश्रित आहार ग्रहण करता है। प्रति प्रश्न किया गया कि गर्भगत जीव कौन-सा आहार ग्रहण करेगा? उत्तर दिया गया कि गर्भगत जीव उसकी माता वो जो आहार लेती है, उसके एक देश का आहार ग्रहण कर लेता है।

भगवती सूत्र का वर्णन किया

महाश्रमण

एक और प्रश्न किया गया कि फिर उसे मल-मूत्र, कफ आदि बनता है या नहीं। उत्तर में कहा गया कि नहीं, उसे ऐसा नहीं होता। पुन: प्रश्न किया गया कि क्या वह मुंह से आहार लेता है? उत्तर दिया गया कि नहीं, वह मुंह से आहार लेने में सक्षम नहीं होता। वह अपने समग्र शरीर से आहार ग्रहण कर लेता है। दो नाडिय़ां मातृ जीवरस हरणी और पुत्रजीवरस हरणी। यह नाड़ी ही गर्भस्थ शिशु के आहार ग्रहण करने का माध्यम बनती हैं।

इस भगवती सूत्र के माध्यम से पूरे गर्भ की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। इसके साथ-साथ गर्भवती माता को भी जागरूक रहने की बात बताई गई है कि अगर व जागरूकता के साथ धर्म आदि का अनुपालन करती है तो बच्चे को अच्छे संस्कार भी प्राप्त हो सकते हैं। गर्भ के दौरान मां ऐसी भावना करे कि बच्चा अच्छे संस्कार वाला, ज्ञानवान, विनयवान बने तो अच्छा हो सकता है।

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने कालूयशोविलास में आचार्य कालूगणी के सरदारशहर चतुर्मास और फिर बीदासर चतुर्मास के प्रसंगों व इस दौरान अनेक दीक्षाओं में एक घोर तपस्वी मुनि सुखलालजी स्वामी के दीक्षित होने के प्रसंगों को रोचक ढंग से वर्णित किया।

दर्शनार्थियों का लग रहा तांता

वर्ष 2022 का चतुर्मास छापर में कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्य महाश्रमण की मंगल सन्निध्य में प्रतिदिन दर्शनार्थियों का तांता-सा लगा हुआ है। चतुर्मास के दौरान चार महीने तक स्थाई रूप में रहकर सेवा करने वालों के अलावा प्रतिदिन चाड़वास, बीदासर, लाडनूं, पडि़हारा, राजलदेसर, श्रीडूंगरगढ़ के अलावा बीकानेर और गंगाशहर आदि क्षेत्रों के श्रद्धालु भी आचार्यश्री के दर्शनार्थ उपस्थित हो रहे हैं।

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