बकरी बाईसा की नोट चराई

जो कुछ हुआ उस का हमें व्यक्तिगत रूप से अफसोस है। उसमें इत्ती समझ कहां थी जो समझ पाती कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। भाई ने न जाने कैसे पईसे जोड़े होंगे। न जाने कितनी तकलीफें झेली होंगी। सोचा था कि सपना साकार हो जाएगा। पर निगोड़ी को रास नहीं आया और चर गई। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।

ऊपर के पेरे में कई बातें शुमार है। पेरेग्राफ को खबरिया भाषा में इंट्रो कहा जाता है। इसका मतलब ये कि पहले ही पेरे में खबर का लगभग पूरा निचोड़ और उसके बाद खबर की पूरी विगत। घटना का विस्तृत ब्यौरा। हम उन दिनों पत्रकारिता में भू्रण हुआ करते थे तब इंट्रो लिखाना सिखाया जाता था। जब तक सीनियर्स संतुष्ट नहीं हो जाते। लिखवाते रहते थे। हम लिखते, वो फाड़कर फंैक देते। तब तक लिखवाते रहते जब तक खबर का सार इंट्रो में ना आ जाता। ओके होने पर पीठ भी थपथपाया करते। उसी क्लास का नतीजा है कि हम लिखना सीख गए। अभी भी सीख रहे हैं। सीखने की उम्र तो निर्धारित है नहीं। मानखा चाहे तो ता जिंदगी विद्यार्थी बनकर सीख सकता है। पर वो हूक नई खेप में दिखाई नहीं दे रही।

पहले पेरेग्राफ में अफसोस है। समझ की बात है। मेहनत से कमाई की बचत का जिक्र है। सपने को साकार करने के प्रयास की बात है। और अंत में चराई। इसके माने एक था राजा-एक थी रानी दोनो सो गए खतम कहानी। मूल कहानी में ”मरने की बात कही गई थी। कहते थे ”एक था राजा-एक थी रानी, दोनों मर गए खतम कहानी। हमने उन्हें मारा नहीं। किसी को खामखा क्यूं मारना। हम ठहरे बापूवादी। अहिंसा के पुजारी। लिहाजा राजा-रानी को सुला दिया। अगली सुबह जाग जाएंगे। सोते के सोते रह जाएं तो अफसोस जताना तो बनता है।

अफसोस जताना नया नहीं है। किसी की मौत होने पर अफसोस-दुख जताया जाता है। कोई असफल रह जाए तो दिलासा दी जाती है। हादसा होने पर अफसोस व्यक्त किया जाता है। दुख से भरी खबर पर अफसोस जताया जाता है। वो समाचार-घटना ही ऐसी थी कि अफसोस जताना वाजिब।
अब बात समझ की। इसका नाप-तोल निर्धारित नहीं है। नीली छतरी वाले ने सबको समझ दी है पर किसी को ज्यादा-किसी को कम। उसका इस्तेमाल वो कैसे करता है-यह उसकी समझ पर निर्भर। किसी की सोच-समझ अच्छी, किसी की बुरी। किसी की समझ सकारात्मक। किसी कि नकारात्मक। किसी कि समझ उच्च स्तरीय। किसी की घटिया। किसी की समझ का सांचा खाली। किसी के पास इतनी समझ कि दिमाग से छलकती नजर आती है। वो भले ही अपने आपको हूशियार समझें पर आम लोग उन्हें डेढ हूशियार कहने से परहेज नहीं रखते। समझ पशु-पक्षियों में भी होती है। उस घटना के बाद कई लोगों की समझ हिल गई। समझ में नहीं आया कि उसे यह क्या सूझी कि नोट चर गइ

चरना-चराई और चारा एक ही थैली के चट्टे बट्टे। किसी जमाने में भले ही इनको अलग-अलग रूप से परिभाषित किया जाता रहा हो। आजकल सबमें घालमेल। जिस चारे-चराई पर पशुओं का एकाधिकार था उस पर मानखा जमात ने अतिक्रमण कर लिया। किसी को बार-बार कुछ ना कुछ खाता हुआ देखकर कहते हैं-”दिन भर की न की चरतौ रेवै। कोई कहता है-”चरने के अलावा कुछ और काम है कि नही।

गाय चारा चरती है। भैंस चारा चरती है। बकरी चारा चरती है पशुपालक गोचर क्षेत्र में पशु छोड़ देते हैं। जहां चराई होती है। चारा हरा। चारा सूखा। कई पशुपालक चारे में पौष्टिक आहार डालकर पशुओं को खिलाते हैं। बिहार में चारे के नाम पर करोड़ों की चराई हो गई। चारा कांड जगचावा हो गया। कई लोग घूस को चारा कहते हैं। शिकारी लोग शेर का शिकार करने के लिए बकरे-बकरी का चारे के रूप में इस्तेमाल करते थे। पर वहां जो चराई हुई उसने ललाट में बल डाल दिए। समझ में नहीं आया कि वो चारा कांड के बदले का ट्रेलर था या कुछ और। जो कुछ भी था। था हैरतनाक।

हवा योगीजी के कानपुर से आई। वहां एक बकरी बासठ हजार के नोट चर गई। बकरी के मालिक ने यह कम घर बनवाने के लिए जमा की थी। रूपए पेंट की जेब में रखे थे। पेंट खूंटी पर टंगी थी। मालिक नहाने चला गया। वापस आया तो देखा कि पेंट नीचे पड़ी थी और बकरी बाईसा आराम से नोट चर रही थी। मालिक दो हजार का एक नोट तो बचाने में सफल हो गया मगर इकत्तीस नोटों की लुगदी बन गई। बकरी बासठ हजार रूपए चर गई। मालिक पर कैसी गुजरी होगी यह बताने की जरूरत नहीं। बिचारे का घर बसाने का सपना दरक गया। बकरी ने नोट ही क्यूं चरे यह सवाल भी ठाठे मार रहा है। हो सकता है उसने चेतावनी दी हो कि तुम हमारा चारा चर सकते हो तो हमें भी बदला लेना आता है।

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